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पहचान, संघर्ष और आध्यात्मिकता की अनोखी कहानी है फिल्म ‘द वॉटर्स ऑफ बहुचर’ ,बिलासपुर और गिरधरपुर में हुई शूटिंग

पहचान, संघर्ष और आध्यात्मिकता की अनोखी कहानी है फिल्म ‘द वॉटर्स ऑफ बहुचर’ ,बिलासपुर और गिरधरपुर में हुई शूटिंग 

क्वियर संवेदना और लोककथा का समकालीन रूपांतरण, बहुली के फेंसर बनने के सपने और पहचान की तलाश को दिखाती है फिल्म

ग्रेटर नोएडा । गुजराती लोककथा से प्रेरित फिल्म ‘द वॉटर्स ऑफ बहुचर’ पहचान, लैंगिकता, प्रेम, पारिवारिक रिश्तों और सामाजिक स्वीकार्यता जैसे संवेदनशील विषयों को एक अनोखे अंदाज में प्रस्तुत करती है। फिल्म की कहानी गुजरात के एक छोटे से कस्बे की पृष्ठभूमि में रची गई है और इसकी आत्मा में क्वियर संवेदना गहराई से जुड़ी हुई है।

फिल्म की केंद्रीय पात्र बहुली एक युवा और महत्वाकांक्षी फेंसर है, जो प्रोफेशनल फेंसिंग में अपना करियर बनाने का सपना देखती है। किशोरावस्था के दौरान बहुली अपनी पहचान और शरीर को लेकर गहरे अंतर्द्वंद्व से गुजरती है। वह स्वयं को लड़के के रूप में महसूस करती है, जबकि उसका जन्म लड़की के शरीर में हुआ है। अपनी पहचान को समझने और स्वीकार करने की इस यात्रा में उसे समाज की रूढ़िवादी सोच, बुलीइंग और सामाजिक दबाव का सामना करना पड़ता है।

बहुली के जीवन में दोस्त के प्रति एकतरफा और जटिल प्रेम भी उसके संघर्ष को और गहरा करता है। वहीं, माता-पिता के साथ उसके रिश्ते, पारिवारिक मतभेद और समाज की अपेक्षाएं उसे लगातार सवालों के घेरे में खड़ा करती हैं। इन परिस्थितियों के बीच वह अपनी पहचान और अपने सपनों के लिए संघर्ष करती रहती है।कहानी में एक महत्वपूर्ण मोड़ तब आता है, जब बहुली की मुलाकात बालवी से होती है। बालवी एक ट्रांस महिला हैं, जिनके व्यक्तित्व में रहस्य, आध्यात्मिकता और दिव्यता का अनूठा संगम दिखाई देता है। बालवी बहुली की मार्गदर्शक बनने के साथ-साथ उसे एक चैंपियन फेंसर बनने के लिए प्रशिक्षित करती हैं। धीरे-धीरे उनका रिश्ता आध्यात्मिक गुरु और शिष्य का रूप ले लेता है। बालवी के साथ बहुली की मुलाकात उसके जीवन की दिशा बदलने वाली साबित होती है।

‘द वॉटर्स ऑफ बहुचर’ को LGBTQI+ समुदाय के प्रतिनिधित्व के लिहाज से भी खास फिल्म माना जा रहा है। फिल्म में क्वियर किरदारों के लिए क्वियर कलाकारों को ही कास्ट किया गया है। ऐसे में फिल्म न केवल पहचान और लैंगिकता के सवालों को सामने लाती है, बल्कि प्रेम, परिवार, सामाजिक स्वीकृति और आध्यात्मिकता के बीच व्यक्ति की अपनी पहचान तलाशने की संवेदनशील कहानी भी कहती है।

फिल्म में श्रुति सितारा ने बालवी, एक दिव्य ट्रांस देवी की भूमिका निभाई है। फिल्म का निर्माण Ssquare Production के बैनर तले किया गया है। बिलासपुर कस्बे और गिरधरपुर गाँव में इसकी शूटिंग हुई इसके निर्देशक प्रशांत सिंह हैं, जबकि बोइशाली सिन्हा और प्रबोध मिश्रा निर्माता हैं।लोककथा, खेल, पहचान और आध्यात्मिकता को एक साथ पिरोती यह फिल्म दर्शकों के सामने एक ऐसी कहानी रखने का प्रयास करती है, जो सामाजिक रूढ़ियों से आगे बढ़कर व्यक्ति को उसकी अपनी पहचान के साथ स्वीकार करने का संदेश देती है।

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