विश्व कपास दिवस पर श्री द्रोणाचार्य पीजी कॉलेज में जागरूकता कार्यक्रम आयोजित
कपास की कहानी खेत से वस्त्र तक, विद्यार्थियों ने जाना प्राकृतिक रेशे का महत्व
विश्व कपास दिवस पर श्री द्रोणाचार्य पीजी कॉलेज में जागरूकता कार्यक्रम आयोजित

दनकौर। श्री द्रोणाचार्य पीजी कॉलेज, दनकौर के गृह विज्ञान विभाग की ओर से विश्व कपास दिवस के अवसर पर विद्यार्थियों को कपास के महत्व और उसके उत्पादन से वस्त्र निर्माण तक की पूरी प्रक्रिया से परिचित कराने के लिए जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम की थीम ‘कपास: खेत से वस्त्र तक’ रही।
कार्यक्रम में गृह विज्ञान विभाग की आचार्य डॉ. निशा शर्मा ने विद्यार्थियों को कपास की खेती, उत्पादन, रेशे की प्राप्ति और उसे वस्त्र में परिवर्तित करने की प्रक्रिया के बारे में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि कपास एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक रेशा है, जिसका उपयोग केवल कपड़े बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि दैनिक जीवन में उपयोग होने वाली अनेक वस्तुओं के निर्माण में भी किया जाता है।
डॉ. निशा शर्मा ने कपास उत्पादन में किसानों के महत्वपूर्ण योगदान को रेखांकित करते हुए कहा कि कपास की यात्रा खेतों में किसानों के परिश्रम से शुरू होकर वस्त्र उद्योग तक पहुंचती है और अंततः हमारे दैनिक जीवन का हिस्सा बनती है। उन्होंने विद्यार्थियों को प्राकृतिक संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग, पर्यावरण संरक्षण तथा टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल उत्पादन के प्रति भी जागरूक किया।
कार्यक्रम के दौरान विद्यार्थियों को संदेश दिया गया कि कपास केवल एक प्राकृतिक रेशा नहीं, बल्कि किसान के परिश्रम, प्रकृति की देन और हमारे दैनिक जीवन से जुड़ा महत्वपूर्ण संसाधन है।
गृह विज्ञान विभाग के विद्यार्थियों ने कार्यक्रम में उत्साहपूर्वक भाग लिया और कपास के सामाजिक, आर्थिक, पर्यावरणीय एवं व्यावहारिक महत्व को समझा। विभिन्न गतिविधियों के माध्यम से विद्यार्थियों को प्राकृतिक रेशों के उपयोग तथा उनके महत्व की व्यावहारिक जानकारी भी दी गई।
कार्यक्रम में कॉलेज के अन्य शिक्षक भी उपस्थित रहे और उन्होंने विद्यार्थियों का उत्साहवर्धन किया। कार्यक्रम का उद्देश्य विद्यार्थियों में प्राकृतिक रेशों के प्रति वैज्ञानिक एवं व्यावहारिक समझ विकसित करने के साथ-साथ कृषि, किसान, प्रकृति और वस्त्र उद्योग के बीच संबंधों को समझाना रहा।
गृह विज्ञान विभाग की यह पहल विद्यार्थियों को पाठ्यक्रमीय ज्ञान से आगे बढ़कर प्रकृति, कृषि और दैनिक जीवन के बीच संबंधों को समझने का सार्थक अवसर प्रदान करने वाली रही।




