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पार्किंसन रोग: बढ़ते मामले और समय पर पहचान की जरूरत

पार्किंसन रोग: बढ़ते मामले और समय पर पहचान की जरूरत

ग्रेटर नोएडा।पार्किंसन रोग के बढ़ते मामलों को लेकर विशेषज्ञों ने चिंता जताई है, खासकर कम उम्र के लोगों में इसके बढ़ते प्रभाव को लेकर। बदलती जीवनशैली, तनाव और पर्यावरणीय कारकों के कारण यह बीमारी अब पहले की तुलना में अधिक तेजी से सामने आ रही है। डॉक्टरों के अनुसार, इसके शुरुआती लक्षण अक्सर नजरअंदाज कर दिए जाते हैं, जिससे मरीज देर से इलाज के लिए पहुंचते हैं। समय पर पहचान, सही उपचार और सक्रिय जीवनशैली अपनाकर इस रोग की प्रगति को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।

डॉ रजत चोपड़ा, सीनियर कंसलटेंट एंड हेड न्यूरोलॉजी यथार्थ हॉस्पिटल मॉडल टाउन नई दिल्ली* का कहना है, “पार्किंसन रोग एक न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारी है, जो मुख्य रूप से मस्तिष्क में डोपामिन की कमी के कारण होती है। इसके शुरुआती लक्षण जैसे हाथों में हल्का कंपन, चलने में धीमापन, शरीर में जकड़न या लिखावट में बदलाव अक्सर नजरअंदाज हो जाते हैं। आजकल कम उम्र के लोगों में भी इसके मामले बढ़ते दिख रहे हैं, जिसके पीछे जीवनशैली, तनाव और पर्यावरणीय कारण जिम्मेदार हो सकते हैं। यह रोग केवल शारीरिक ही नहीं, बल्कि मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य को भी प्रभावित करता है। समय पर पहचान और सही इलाज से इसकी प्रगति को काफी हद तक धीमा किया जा सकता है। दवाइयों के साथ-साथ फिजियोथेरेपी, नियमित व्यायाम और पुनर्वास बेहद महत्वपूर्ण हैं। ओपीडी डेटा में भी अब विभिन्न आयु वर्गों में मामलों की बढ़ती संख्या और देर से निदान एक चिंता का विषय बनकर उभर रहा है।”

डॉ. सत्यान नंदा, सीनियर कंसल्टेंट एवं विभागाध्यक्ष (न्यूरोलॉजी), यथार्थ हॉस्पिटल, सेक्टर 110, नोएडा* का कहना है, “पार्किंसन रोग के शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज करना गंभीर हो सकता है। समय पर पहचान और सही उपचार से मरीज लंबे समय तक सामान्य और स्वतंत्र जीवन जी सकते हैं।: हमारी ओपीडी के आंकड़ों के अनुसार, वर्तमान में लगभग 10% मरीज पार्किंसन और संबंधित मूवमेंट डिसऑर्डर से जुड़े होते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में इन मामलों में लगातार वृद्धि दर्ज की गई है, विशेष रूप से 40–60 वर्ष आयु वर्ग में। चिंता की बात यह है कि अधिकांश मरीज शुरुआती अवस्था के बजाय मध्यम अवस्था में अस्पताल पहुंचते हैं, जिससे उपचार में देरी होती है। पार्किंसन रोग एक प्रगतिशील न्यूरोलॉजिकल बीमारी है, जो मस्तिष्क में डोपामिन बनाने वाली कोशिकाओं के धीरे-धीरे नष्ट होने के कारण होती है। इसके प्रमुख कारणों में बढ़ती उम्र, आनुवंशिक कारक, प्रदूषण, कीटनाशकों का संपर्क और सिर की चोट शामिल हैं, हालांकि कई मामलों में इसका सटीक कारण स्पष्ट नहीं हो पाता। विशेषज्ञों का कहना है कि अब 30 से 50 वर्ष की आयु वर्ग में भी पार्किंसन के मामलों में बढ़ोतरी देखी जा रही है। इसके पीछे तनावपूर्ण जीवनशैली, रसायनों के संपर्क, बेहतर जांच सुविधाएं और आनुवंशिक कारणों की भूमिका मानी जा रही है। इस बीमारी के शुरुआती लक्षण अक्सर नजरअंदाज कर दिए जाते हैं, जैसे एक हाथ में हल्का कंपन, शरीर की गति धीमी होना, जकड़न, चलते समय हाथों का कम हिलना, आवाज का धीमा होना, कब्ज, सूंघने की क्षमता में कमी और नींद से जुड़ी समस्याएं। यही कारण है कि मरीज देर से उपचार के लिए पहुंचते हैं। पार्किंसन रोग केवल शारीरिक ही नहीं, बल्कि मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य को भी प्रभावित करता है। मरीजों में अवसाद, चिंता, याददाश्त में कमी और नींद की समस्या आम है, जिससे उनकी जीवन गुणवत्ता प्रभावित होती है। हालांकि इसका स्थायी इलाज उपलब्ध नहीं है, लेकिन लेवोडोपा जैसी दवाओं और अन्य आधुनिक उपचारों से इसे प्रभावी रूप से नियंत्रित किया जा सकता है। चयनित मरीजों में डीप ब्रेन स्टिमुलेशन (DBS) सर्जरी भी लाभकारी साबित होती है। नियमित रूप से न्यूरोलॉजिस्ट से परामर्श लेना जरूरी है। विशेषज्ञों के अनुसार, शुरुआती पहचान और सक्रिय जीवनशैली इस बीमारी के प्रबंधन में अहम भूमिका निभाते हैं। नियमित व्यायाम, योग, फिजियोथेरेपी, स्पीच थेरेपी और संतुलित आहार अपनाकर मरीज बेहतर जीवन जी सकते हैं। डॉक्टरों ने लोगों से अपील की है कि यदि ऐसे शुरुआती लक्षण दिखाई दें, तो उन्हें नजरअंदाज न करें और तुरंत विशेषज्ञ से सलाह लें। डॉ. पूजा नारंग, कंसल्टेंट – न्यूरोलॉजी, यथार्थ सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल, नोएडा एक्सटेंशन के अनुसार, पहले जहां यह बीमारी मुख्य रूप से 60 वर्ष से अधिक आयु वर्ग में देखी जाती थी, वहीं अब 50–70 वर्ष आयु वर्ग के साथ-साथ युवाओं में भी इसके मामले सामने आने लगे हैं। ओपीडी डेटा यह भी दर्शाता है कि अधिकांश मरीज अस्पताल तब पहुंचते हैं, जब रोग मध्यम अवस्था (Moderate Stage) में पहुंच चुका होता है। इसका प्रमुख कारण शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज करना या उन्हें सामान्य उम्र-संबंधी समस्याएं समझ लेना है। हाथों में हल्का कंपन, शरीर में जकड़न, चलने में धीमापन, नींद की समस्या और सूंघने की क्षमता में कमी जैसे संकेत अक्सर समय रहते पहचाने नहीं जाते। डॉ पूजा नारंग बताती हैं कि बेहतर डायग्नोस्टिक सुविधाओं के कारण मामलों की पहचान में वृद्धि हो रही है।

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