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26 हफ्ते में जन्मे नन्हे ने फेलिक्स हॉस्पिटल में जीती जिंदगी की जंग, 660 ग्राम से 1600 ग्राम तक पहुंचा वजन 

26 हफ्ते में जन्मे नन्हे ने फेलिक्स हॉस्पिटल में जीती जिंदगी की जंग, 660 ग्राम से 1600 ग्राम तक पहुंचा वजन 

नोएडा। महज 26 हफ्ते के 660 ग्राम वजन के साथ जन्मे एक प्री-टर्म बच्चे ने फेलिक्स अस्पताल के डॉक्टरों की मेहनत और समय पर मिले इलाज की बदौलत जिंदगी की जंग जीत ली। डॉक्टरों के मुताबिक फर्रुखाबाद में जन्मे इस बच्चे को करीब 300 किलोमीटर दूर नोएडा लाना अपने आप में बड़ी चुनौती था। लेकिन विशेषज्ञों की देखरेख में इलाज के बाद अब बच्चे का वजन बढ़कर 1640 ग्राम हो गया है और उसकी स्थिति स्थिर है। उसे अस्पताल से डिस्चार्ज कर दिया गया है। परिजन ने अस्पताल और डॉक्टरों का आभार जताया है।फेलिक्स अस्पताल के पीडियाट्रिक एंड नियोनेटोलॉजिस्ट कंसलटेंट डॉ. नीरज कुमार ने बताया कि बच्चा दिव्या गुप्ता का है, जिसका जन्म समय से पहले यानी प्री-टर्म हुआ था। जन्म के समय उसका वजन बेहद कम यानी मात्र 660 ग्राम था, जिसे मेडिकल भाषा में ‘एक्सट्रीम लो बर्थ वेट’ माना जाता है। ऐसे बच्चों में जीवित रहने की संभावना भी कम होती है और कई तरह की जटिलताओं का खतरा बना रहता है। डॉक्टर ने बताया कि फर्रुखाबाद से नोएडा तक बच्चे को सुरक्षित लाना बेहद कठिन कार्य था। इतनी लंबी दूरी में नवजात की सांस, तापमान और अन्य महत्वपूर्ण पैरामीटर को स्थिर बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती होती है। रास्ते में थोड़ी भी लापरवाही जानलेवा साबित हो सकती थी। बावजूद इसके बच्चे को सुरक्षित अस्पताल पहुंचाया गया। अस्पताल पहुंचते ही बच्चे को एनआईसीयू (नवजात गहन चिकित्सा इकाई) में भर्ती कर लिया गया। शुरुआत में बच्चे को सांस लेने में दिक्कत थी, इसलिए उसे सीपेप सपोर्ट पर रखा गया। प्री-टर्म बच्चों में फेफड़ों का पूर्ण विकास नहीं होता, जिससे सांस संबंधी समस्याएं आम होती हैं। इसके अलावा संक्रमण, दिमागी विकास में बाधा, आंखों की बीमारी और ब्लड की कमी जैसी समस्याओं का भी खतरा रहता है। मगर डॉक्टरों की टीम ने लगातार निगरानी और आधुनिक तकनीक के जरिए बच्चे का इलाज किया। करीब पांच-छह दिन बाद उसकी स्थिति में सुधार होने पर उसे सीपेप से हटाकर एचएफएनसी सपोर्ट पर ट्रांसफर किया गया। इसके बाद बच्चे ने बेहतर रिस्पांस देना शुरू किया। उपचार के दौरान बार-बार ब्लड ट्रांसफ्यूजन, सेंट्रल लाइन के माध्यम से टोटल पैरेंट्रल न्यूट्रिशन (टीपीएन ), फेफड़ों की परिपक्वता के लिए सर्फैक्टेंट, और अन्य सहायक उपाय दिए गए।

जिससे उसकी स्थिति में और सुधार हुआ। बच्चा लगभग 72 दिन तक फेलिक्स अस्पताल में विशेषज्ञों की देखरेख में एडमिट रहा।सबसे राहत की बात यह रही कि इतने लंबे इलाज के बाद भी बच्चा पूरी तरह से न्यूरोलॉजिकली फिट है। फिलहाल बच्चा पूरी तरह स्वस्थ है और उसे डिस्चार्ज कर दिया गया है। बच्चों के परिजन ने पूरी टीम और अस्पताल का धन्यवाद किया है। आमतौर पर ऐसे मामलों में दिमाग पर असर पड़ने का खतरा रहता है, लेकिन समय पर और सही इलाज के कारण इस बच्चे में ऐसा कोई नुकसान नहीं हुआ। साथ ही आंखों से जुड़ी गंभीर बीमारी ‘रेटिनोपैथी ऑफ प्रीमैच्योरिटी’ का खतरा भी टल गया। अगर इस बच्चे को समय पर इलाज नहीं मिलता, तो उसे कई गंभीर समस्याएं हो सकती थीं। इनमें सांस लेने में स्थायी दिक्कत, दिमागी विकास में कमी, दृष्टि संबंधी समस्या या यहां तक कि जान का खतरा भी शामिल है। ऐसे बच्चों का इलाज केवल उन्नत सुविधाओं वाले अस्पतालों के एनआईसीयू में ही संभव है, जहां प्रशिक्षित डॉक्टर, नर्सिंग स्टाफ और अत्याधुनिक उपकरण उपलब्ध हों। प्री-टर्म डिलीवरी की स्थिति में तुरंत विशेषज्ञ अस्पताल का रुख जरूरी है। नवजात को गर्म रखना, संक्रमण से बचाना और समय पर इलाज कराना बेहद जरूरी होता है। साथ ही गर्भावस्था के दौरान नियमित जांच और डॉक्टर की सलाह का पालन करने से भी ऐसे मामलों को काफी हद तक रोका जा सकता है। यदि इस बच्चे को अस्पताल लाने में देरी होती तो उसकी हालत और बिगड़ सकती थी। लंबे समय तक बिना उचित मेडिकल सपोर्ट के रहने से फेफड़ों, दिमाग और अन्य अंगों को स्थायी नुकसान पहुंच सकता था।

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