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इनॉवेटिव इंस्टीट्यूट ऑफ लॉ, ग्रेटर नोएडा में ‘महिलाएँ, विधि एवं राष्ट्र निर्माण’ विषय पर राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित, लैंगिक न्याय पर हुआ व्यापक विचार-विमर्श

महिलाएँ, विधि एवं राष्ट्र निर्माण : लैंगिक न्याय की दिशा में राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन

इनॉवेटिव इंस्टीट्यूट ऑफ लॉ, ग्रेटर नोएडा में ‘महिलाएँ, विधि एवं राष्ट्र निर्माण’ विषय पर राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित, लैंगिक न्याय पर हुआ व्यापक विचार-विमर्श

ग्रेटर नोएडा स्थित इनॉवेटिव इंस्टीट्यूट ऑफ लॉ में “महिलाएँ, विधि एवं राष्ट्र निर्माण : विकसित भारत मिशन 2047 के अंतर्गत लैंगिक न्याय की दिशा में” विषय पर एक भव्य राष्ट्रीय सम्मेलन का सफल आयोजन किया गया। इस महत्वपूर्ण शैक्षणिक आयोजन में देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों, विधि संस्थानों और शोध संस्थानों से आए शिक्षाविदों, शोधार्थियों, विधि विशेषज्ञों तथा विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। सम्मेलन का उद्देश्य महिलाओं के अधिकारों, उनकी कानूनी स्थिति तथा राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में उनकी सक्रिय और सशक्त भूमिका पर गंभीर शैक्षणिक विमर्श को बढ़ावा देना था। कार्यक्रम में संस्थान के चेयरमैन प्रो. के. आर. शर्मा, डीन एकेडमिक डॉ. तितिक्षा शर्मा, प्राचार्य डॉ. मृत्युञ्जय पांडेय, डॉ. शैवाल स्त्यार्थी तथा डॉ. अमरेन्द्र कुमार अजीत सहित अनेक प्रतिष्ठित शिक्षाविद् एवं छात्र-छात्राएँ उपस्थित रहे। सम्मेलन के दौरान महिला सशक्तिकरण, लैंगिक समानता, संविधानिक अधिकारों, सामाजिक न्याय तथा नीति निर्माण में महिलाओं की भागीदारी जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर गहन विचार-विमर्श किया गया।कार्यक्रम का शुभारंभ पारंपरिक दीप प्रज्वलन के साथ हुआ, जिसके माध्यम से ज्ञान, प्रगति और सामाजिक चेतना के प्रतीक स्वरूप सम्मेलन की औपचारिक शुरुआत की गई। इसके उपरांत संस्थान के प्राचार्य डॉ. मृत्युञ्जय पांडेय ने सभी अतिथियों का पुष्पगुच्छ भेंट कर हार्दिक स्वागत एवं अभिनंदन किया। अपने स्वागत भाषण में उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में लैंगिक समानता और न्याय की स्थापना केवल सामाजिक आवश्यकता ही नहीं बल्कि संवैधानिक प्रतिबद्धता भी है। उन्होंने यह भी कहा कि शिक्षा और विधि के माध्यम से ही समाज में समान अवसरों और न्यायपूर्ण व्यवस्था की स्थापना संभव है। उन्होंने विद्यार्थियों और शोधार्थियों को प्रेरित करते हुए कहा कि ऐसे शैक्षणिक मंच उन्हें समसामयिक सामाजिक और कानूनी मुद्दों पर विचार करने तथा अपने शोध को व्यापक समाज के हित में उपयोग करने का अवसर प्रदान करते हैं।इस अवसर पर चेयरमैन प्रो. के. आर. शर्मा ने अपने संबोधन में कहा कि राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में महिलाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण और अनिवार्य है। उन्होंने कहा कि किसी भी समाज की प्रगति का वास्तविक मापदंड उस समाज में महिलाओं की स्थिति और उन्हें प्राप्त अवसरों से निर्धारित होता है। उन्होंने इस बात पर विशेष बल दिया कि महिलाओं को शिक्षा, संपत्ति, रोजगार और निर्णय-निर्माण की प्रक्रियाओं में समान अवसर प्रदान करना एक सशक्त और समावेशी समाज के निर्माण की दिशा में आवश्यक कदम है। उन्होंने यह भी कहा कि विकसित भारत मिशन 2047 के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए महिलाओं की सक्रिय भागीदारी और सशक्तिकरण अत्यंत आवश्यक है।डीन एकेडमिक डॉ. तितिक्षा शर्मा ने अपने संबोधन में महिलाओं के संपत्ति अधिकार (Proprietary Rights) के विषय पर विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि भारतीय विधिक व्यवस्था ने समय-समय पर अनेक सुधारों के माध्यम से महिलाओं को संपत्ति में समान अधिकार प्रदान किए हैं। उन्होंने हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम सहित विभिन्न कानूनी प्रावधानों का उल्लेख करते हुए बताया कि इन सुधारों ने महिलाओं के सामाजिक और आर्थिक सशक्तिकरण को मजबूत आधार प्रदान किया है। उन्होंने विद्यार्थियों को यह भी प्रेरित किया कि वे विधि के माध्यम से समाज में न्याय और समानता की स्थापना के लिए सक्रिय भूमिका निभाएँ।सम्मेलन में मुख्य वक्ताओं के रूप में उपस्थित शिक्षाविदों ने महिलाओं से संबंधित संवैधानिक और कानूनी अधिकारों पर महत्वपूर्ण विचार प्रस्तुत किए। इस अवसर पर डॉ. शैवाल स्त्यार्थी ने भारतीय संविधान में निहित विभिन्न प्रावधानों—विशेषकर समानता के अधिकार, स्वतंत्रता के अधिकार और जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार—के माध्यम से महिलाओं को प्राप्त संरक्षण और अवसरों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि संविधान ने महिलाओं को सम्मानजनक जीवन जीने का अधिकार प्रदान किया है और समाज की जिम्मेदारी है कि इन अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित की जाए।इसी क्रम में डॉ. अमरेन्द्र कुमार अजीत ने अपने वक्तव्य में महिला सशक्तिकरण और न्यायिक सक्रियता (Judicial Activism) की भूमिका पर चर्चा करते हुए कहा कि न्यायपालिका ने अनेक ऐतिहासिक निर्णयों के माध्यम से महिलाओं के अधिकारों की रक्षा और उन्हें सशक्त बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उन्होंने यह भी कहा कि विधि और समाज के बीच संतुलन स्थापित करने के लिए निरंतर संवाद और शैक्षणिक शोध अत्यंत आवश्यक है।इस राष्ट्रीय सम्मेलन में देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों और विधि संस्थानों से बड़ी संख्या में शोध पत्र प्राप्त हुए। सम्मेलन के लिए कुल लगभग 100 शोध पत्र देश के विभिन्न राज्यों से प्राप्त हुए, जिनमें से चयनित शोध पत्रों को प्रस्तुतीकरण हेतु आमंत्रित किया गया। इन शोध पत्रों में महिलाओं के संवैधानिक अधिकार, कार्यस्थल पर लैंगिक समानता, घरेलू हिंसा के विरुद्ध कानून, साइबर अपराध और महिलाओं की सुरक्षा, महिला नेतृत्व और नीति निर्माण, लैंगिक न्याय की दिशा में न्यायिक निर्णयों की भूमिका, तथा विकसित भारत मिशन 2047 के संदर्भ में महिला सशक्तिकरण जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर शोध प्रस्तुत किए गए। विभिन्न तकनीकी सत्रों में शोधार्थियों और प्रतिभागियों ने अपने शोध पत्रों का प्रस्तुतीकरण किया, जिन पर विशेषज्ञों द्वारा विस्तृत चर्चा और मार्गदर्शन प्रदान किया गया।सम्मेलन के दौरान आयोजित तकनीकी सत्रों में प्रतिभागियों ने अपने विचारों और शोध निष्कर्षों को साझा किया, जिससे एक समृद्ध शैक्षणिक संवाद का वातावरण निर्मित हुआ। देश के विभिन्न राज्यों से आए प्रतिभागियों ने महिला अधिकारों और लैंगिक न्याय के संदर्भ में विभिन्न सामाजिक, कानूनी और नीतिगत पहलुओं पर महत्वपूर्ण सुझाव प्रस्तुत किए। इन चर्चाओं के माध्यम से यह स्पष्ट हुआ कि महिलाओं की प्रगति केवल सामाजिक विकास का प्रश्न नहीं है बल्कि यह राष्ट्र की समग्र प्रगति और लोकतांत्रिक मूल्यों की मजबूती से भी जुड़ा हुआ है।इस अवसर पर संस्थान के जर्नल डायरेक्टर डॉ. देवाशीष गौर तथा फाइनेंशियल डायरेक्टर ने भी सम्मेलन की सफलता के लिए अपनी शुभकामनाएँ प्रेषित कीं और कहा कि ऐसे शैक्षणिक कार्यक्रम विद्यार्थियों और शोधार्थियों के लिए अत्यंत प्रेरणादायक होते हैं। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित इस प्रकार के सम्मेलन ज्ञान के आदान-प्रदान के साथ-साथ नई शोध संभावनाओं को भी प्रोत्साहित करते हैं।कार्यक्रम के दौरान विद्यार्थियों ने भी सक्रिय भागीदारी निभाई और विभिन्न विषयों पर अपने विचार प्रस्तुत किए। इस सम्मेलन ने विद्यार्थियों को न केवल शैक्षणिक दृष्टि से समृद्ध किया बल्कि उन्हें सामाजिक जिम्मेदारियों के प्रति भी जागरूक किया। प्रतिभागियों ने कहा कि इस प्रकार के सम्मेलन उन्हें अपने शोध को व्यापक मंच पर प्रस्तुत करने तथा विशेषज्ञों से मार्गदर्शन प्राप्त करने का महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करते हैं।सम्मेलन के अंत में आयोजकों ने सभी अतिथियों, वक्ताओं, शोधार्थियों, शिक्षकों और विद्यार्थियों के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने आशा व्यक्त की कि इस सम्मेलन के माध्यम से प्राप्त विचार और सुझाव समाज में लैंगिक न्याय और महिला सशक्तिकरण की दिशा में सकारात्मक परिवर्तन लाने में सहायक सिद्ध होंगे।

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