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जीबीयू में बौद्ध पर्यटन एवं विरासत में स्नातकोत्तर कोर्स इस सत्र से चलेगी

जीबीयू में बौद्ध पर्यटन एवं विरासत में स्नातकोत्तर कोर्स इस सत्र से चलेगी

गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय में चल रहे प्रवेश प्रक्रिया में इस वर्ष बौद्ध पर्यटन एवं विरासत में स्नातकोत्तर डिप्लोमा कोर्स, बौद्ध अध्ययन एवं सभ्यता संकाय द्वारा इस सत्र (२०२१-२०२२) के लिए प्रस्ताव किया गया था। विश्वविद्यालय प्रशासन ने इस शैक्षणिक सत्र में विदेशी छात्रों के रुझान को देखते हुए इसे चलाने का निर्णय लिया है।

बौद्ध पर्यटन एवं विरासत में स्नातकोत्तर डिप्लोमा के निम्न उद्देश्य हैं:
१. छात्रों को अतीत और वर्तमान की समृद्ध बौद्ध साहित्यिक और दार्शनिक विरासत को समझने का अवसर प्रदान करना
२. छात्रों को एशिया में बौद्ध धर्म का इतिहास एवं विस्तार
३. विश्व बौद्ध विरासत से परिचित कराना
४. छात्रों को भारतवर्ष एवं एशिया के विभिन्न क्षेत्रों से बौद्ध वास्तुकला और विभिन्न दृश्य कला-रूपों का ज्ञान देना
५. पर्यटन के मूल सिद्धांतों में छात्रों को प्रशिक्षित करना।
६. पर्यटन के व्यावसायिक पहलुओं एवं उनके प्रबंधन से आवश्यक मार्गदर्शन और प्रशिक्षण देना।

चूँकि २५६० वर्षों से भारतवर्ष में बौद्ध धर्म की एक समृद्ध विरासत है और यह विरासत दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों में भी फैली हुई है। बुद्ध के समय से ही, उनकी शिक्षाओं का प्रसार भारत के विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय भिक्षुओं के समुदाय के माध्यम से होने लगा, जो बौद्ध धर्म के राजदूत के रूप में कार्य करते थे। अशोक के काल में बौद्ध धर्म भारत की सीमाओं को लांघकर पड़ोसी देशों में विस्तारित हो गया। अशोक ने स्वयं बड़ी संख्या में बौद्ध स्मारकों का निर्माण किया और विभिन्न व्यापार मार्गों और बुद्ध से संबंधित महत्वपूर्ण स्थलों पर अपने शिलालेखों को स्थापित किया जो आज भी उपलब्ध हैं और जो आज बौद्ध विरासत की जीती जगती तश्विर है।

भिक्षुओं के समुदाय ने बुद्ध की शिक्षाओं को कई भाषाओं में विस्तृत रूप में संकलित किया। जिसके फलस्वरूप एक समृद्ध पांडुलिपि संस्कृति का जन्म हुआ। भिक्षुओं ने मठों का निर्माण किया जो बाद में शिक्षा के मुख्य केंद्र के रूप में परिवर्तित हो गयी। यही मठ आज के समय में अद्वितीय बौद्ध वास्तुकला से हमें परिचित करातें हैं।

बौद्ध धर्मग्रंथ, बौद्ध अनुयायियों को बुद्ध के जीवन से संबंधित महत्वपूर्ण स्थानों की यात्रा करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं, जिसने लंबे समय तक बौद्ध तीर्थयात्रा को बढ़ावा दिया। बौद्ध तीर्थ यात्रा की शुरुआत प्रामाणिक तौर पर मौर्य सम्राट अशोक के समय से प्रचलित है जब कि बौद्ध पर्यटन के प्रमाण हमें बुद्ध के महापरिनिब्बान सुत्त में देखने को मिलता है। बोधगया और बोधिवृक्ष बौद्ध तीर्थ के आठ तीर्थों में प्रमुख तीर्थ माना जाता है। जो आज के समय में सबसे बड़ी संख्या में विदेशी एवं देशी तीर्थ यात्रियों को आकर्षित करती है।

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